बिहार की राजनीति में इन दिनों तेजस्वी यादव द्वारा उठाए गए ‘डीके टैक्स’ और ‘डीके बॉस’ के मुद्दे ने एक नई हलचल मचा दी है। यह न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। तेजस्वी के इन आरोपों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके करीबी अधिकारियों को बैकफुट पर धकेल दिया है।
क्या है ‘डीके टैक्स’ और ‘डीके बॉस’ का मामला?
तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है कि बिहार में वास्तविक सत्ता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों में नहीं, बल्कि ‘डीके बॉस’ के पास है। उनका दावा है कि राज्य में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो चुकी हैं और ‘डीके टैक्स’ के जरिए अवैध वसूली हो रही है। तेजस्वी का कहना है कि हर थाना और ब्लॉक स्तर पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है और इसे ‘डीके बॉस’ नियंत्रित कर रहे हैं।
तेजस्वी ने कहा कि जल्द ही वे इस पूरे प्रकरण का खुलासा करेंगे और यह साबित करेंगे कि किस प्रकार से वसूली का एक संगठित तंत्र राज्य में काम कर रहा है। उन्होंने ‘डीके टैक्स’ को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि धूमिल करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा बताया।
नीतीश कुमार के करीबी अधिकारी सवालों के घेरे में
बिहार में नीतीश कुमार को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो प्रशासन पर मजबूत पकड़ रखते हैं। उनके करीबी आईएएस अधिकारियों की सूची अक्सर चर्चा में रही है। इनमें दीपक कुमार, प्रत्यय अमृत, संजीव हंस, कुमार रवि, चैतन्य प्रसाद, आनंद किशोर, अनुपम कुमार, और एस सिद्धार्थ जैसे नाम शामिल हैं।
तेजस्वी के आरोपों के बाद, इन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पहले जो अधिकारी हर मीटिंग और कार्यक्रम में नीतीश कुमार के साथ नजर आते थे, अब वे दूरी बनाए हुए दिख रहे हैं। ऐसा लगता है कि तेजस्वी के आरोपों ने इन अधिकारियों की छवि और भूमिका पर भी असर डाला है।
राजनीतिक गरमाहट और प्रशासनिक हलचल
तेजस्वी यादव के आरोपों ने न केवल जेडीयू बल्कि बीजेपी को भी सक्रिय कर दिया है। जेडीयू नेताओं का कहना है कि तेजस्वी का यह बयान केवल ध्यान भटकाने के लिए है। उनका कहना है कि लालू-राबड़ी के शासनकाल में ‘ए, डी, जी और आर टैक्स’ जैसी व्यवस्थाएं थीं, जो उस समय के भ्रष्टाचार का प्रतीक थीं।
दूसरी ओर, यह देखा जा रहा है कि नीतीश कुमार के करीबी अधिकारी अब कम सक्रिय नजर आ रहे हैं। कुछ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के साथ सार्वजनिक उपस्थिति में कमी कर दी है, जबकि अन्य अपने कार्यों को लेकर सुर्खियों में नहीं हैं।
ब्यूरोक्रेसी और सत्ता के समीकरण
नीतीश कुमार के शासनकाल में ब्यूरोक्रेसी ने हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके कार्यकाल में आईएएस अधिकारियों को विशेषाधिकार और जिम्मेदारियां दी गईं। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन अधिकारियों के कारण नीतीश कुमार की सरकार की छवि को नुकसान हो रहा है?
तेजस्वी यादव का यह आरोप कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री के लिए काम करने के बजाय अपनी ताकत और भ्रष्ट तंत्र को मजबूत कर रहे हैं, एक गंभीर मुद्दा है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल सरकार के लिए बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी बड़ा झटका होगा।
भ्रष्टाचार पर सरकार का रुख और जनता की चिंता
बिहार में प्रशासनिक भ्रष्टाचार का मुद्दा नया नहीं है। लेकिन ‘डीके टैक्स’ और ‘डीके बॉस’ जैसे आरोपों ने इसे और भी संवेदनशील बना दिया है। जनता अब सवाल कर रही है कि क्या राज्य में कानून और व्यवस्था वास्तव में मुख्यमंत्री के नियंत्रण में है?
तेजस्वी के आरोपों ने एक बार फिर से बिहार में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित किया है। क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन आरोपों का जवाब देकर अपनी छवि बचा पाएंगे, या तेजस्वी यादव का यह हमला आगामी चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनेगा?
निष्कर्ष
‘डीके टैक्स’ और ‘डीके बॉस’ का मुद्दा सिर्फ एक राजनीतिक आरोप नहीं है, बल्कि यह बिहार के प्रशासन और सत्ता तंत्र पर एक गहरी छाया डालता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश कुमार इन आरोपों से कैसे निपटते हैं और क्या तेजस्वी यादव के दावे बिहार की राजनीति में एक नई दिशा देंगे।
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